#BiharElections2020: कप्तान तेजस्वी को बिहार का मैच जीतना है तो उपकप्तान को चमकना होगा


मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनको चुनौती देने वाले तेजस्वी यादव के बीच बयानबाजी तेज होती जा रही है. जहां ओपिनियन पोल नेशनल डेमोक्रेटिक अलाएंस (NDA) की जीत की भविष्यावाणी कर रहे हैं, वहीं जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के बीच भरोसे की कमी, चिराग पासवान की गुगली और स्वाभाविक एंटी-इनकम्बैंसी के कारण चीजें गठबंधन के लिए जमीन पर उतनी बढ़िया नजर नहीं आ रही हैं.

कम से कम ताजा गुगल ट्रेंड्स पर तेजस्वी नेतृत्व के अंतर को कम करते नजर आ रहे हैं. उनकी रैलियों में अच्छी भीड़ हो रही है और वो पूरी तरह से बेरोजगारी जैसे स्थानीय मुद्दे उठा रहे हैं, जिनकी गूंज युवाओं में सुनाई भी पड़ रही है. पार्टी के सत्ता में आने पर तेजस्वी ने 10 लाख नौकरियों का वादा किया है. नीतीश ने इस पर पलटवार किया कि वे (लालू यादव का परिवार) नौकरी देने के नाम पर अपना व्यवसाय भी शुरू कर सकते हैं.

बिहार का क्रिकेट मैच

बिहार में चुनाव एक क्रिकेट मैच की तरह है. कांग्रेस महागठबंधन/ यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस टीम की वाइस कैप्टन है. कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जो कि कुल सीटों का करीब 30 फीसदी है. 2015 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 41 सीटों पर लड़ी थी और 66 फीसदी- दो-तिहाई की बढ़िया स्ट्राइक रेट से 27 सीटें जीती थी.

कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव के साथ अच्छा सौदा किया, जिन्होंने मेरे हिसाब से 15 सीटें ज्यादा दे दी. कांग्रेस बड़ी संख्या में सीटें हासिल करने में कामयाब रही जो कि अन्यथा मांझी (HAM), कुशवाहा (RLSP) और साहनी (VIP) को मिलतीं अगर वो गठबंधन में बने रहते.

कप्तान तेजस्वी को बिहार का मैच जीतना है तो उपकप्तान को चमकना होगा

कांग्रेस जिन सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उनमें से कुछ सीटों पर पिछले तीन दशकों से कांग्रेस का कोई विधायक नहीं है.

तेजस्वी ने अल्पसंख्यक वोटों, जो राज्य की जनसंख्या का करीब 17 फीसदी हैं, के विभाजन से बचने के लिए ग्रैंड ओल्ड पार्टी को 70 सीटें दी हैं. RJD के कुछ उम्मीदवार कांग्रेस के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं लेकिन उनकी सही संख्या पता नहीं है.

तेजस्वी को अगर नीतीश कुमार को कुर्सी से हटा कर पहली बार मुख्यमंत्री बनना है तो कांग्रेस को बहुत अच्छा प्रदर्शन करने की जरूरत है, कांग्रेस का स्ट्राइक रेट कम से कम 50 फीसदी का होना चाहिए. 1990 के दशक की शुरुआत से मंडल और कमंडल पार्टियों में अपना काफी वोट शेयर गंवाने वाली पार्टी के लिए ये बड़ी चुनौती है. 2015 में भी JD(U) और RJD के वोट ट्रांसफर होने के कारण ही कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था.

नोट: साल 2000 के आंकड़ों में झारखंड भी शामिल है क्योंकि चुनाव एक साथ हुए थे.
नोट: साल 2000 के आंकड़ों में झारखंड भी शामिल है क्योंकि चुनाव एक साथ हुए थे.

बिहार विभाजन के बाद से कांग्रेस का प्रदर्शन

सत्ताधारी गठबंधन में BJP इन फॉर्म खिलाड़ी है, चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें उन्हें ही मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. अगर ये बात गलत भी साबित होती है तो राजनीतिक पंडितों के बीच इस बात पर सहमति है कि वो JD(U) से काफी बेहतर प्रदर्शन करेगी.

कांग्रेस जिन 70 सीटों पर लड़ रही है उनमें 37 पर, आधे से थोड़ा ज्यादा, पार्टी का मुकाबला BJP से है. ग्रैंड ओल्ड पार्टी के लिए ये मुकाबले आसान नहीं होने वाले हैं, क्योंकि BJP उम्मीदवारों पर शायद नीतीश कुमार की JD(U) की तरह एंटी इनकम्बैंसी लागू न हो, क्योंकि भगवा पार्टी किसी तरह NDA सरकार के प्रदर्शन न कर पाने का आरोप सीएम पर मढ़ने में सफल रही है. इसके पास भरोसा करने के लिए मोदी फैक्टर भी है.

कांग्रेस के जीतने की सबसे ज्यादा उम्मीद उन 28 सीटों पर है, जहां उसका मुकाबला JD(U) के उम्मीदवारों से है. NDA का कप्तान JD(U) है लेकिन उसका फॉर्म खराब चल रहा है. RJD की मदद से, जिसके ज्यादातर वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाते हैं, पार्टी को इन सीटों पर जीत हासिल करनी होगी. उसे HAM और VIP जैसी कमजोर विरोधियों से भी पांच सीटें जीतनी होगी.

कांग्रेस के वोटर कौन हैं?

कांग्रेस पिछले दो दशक में ज्यादतर समय लालू की पार्टी के साथ गठबंधन में है और उनकी ताकत पर अपना काम चला रही है. अपने अधिकांश पारंपरिक वोटों को खोने के बाद, आज, इसके दो-तिहाई वोटरों में मुस्लिम और यादव शामिल हैं और उसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों में शामिल जातियां.

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और दलित नेता अशोक चौधरी के पार्टी छोड़ने से भी कांग्रेस कमजोर हुई है, जो 2018 में तीन अन्य विधान पार्षदों के साथ JD(U) में शामिल हो गए थे. सितंबर 2020 में, कांग्रेस के दो विधायक फिर से JD(U) में शामिल हो गए थे. अशोक चौधरी के जाने के बाद कई महीनों तक बिहार में कांग्रेस का कोई अध्यक्ष ही नहीं था.

राज्य में पार्टी के पास अब संगठन ही नहीं बचा है. पार्टी में कार्यकर्ता, कैडर से ज्यादा नेता हैं. राज्य जब महामारी और बाढ़ की चपेट में था, तो अधिकांश नेता जमीन से गायब दिखे. कांग्रेस अपने पारंपरिक वोट बैंक को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस बिहार में एक नए प्रयोग के जरिए अपने पारंपरिक वोट बैंक, सवर्णों, दलितों, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के वोट फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है. पार्टी ने एक ब्राह्मण मदन मोहन झा को अपना प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है. हालांकि वो ब्राह्मण समाज के बड़े नेता नहीं हैं. क्या उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर शीला दीक्षित के नाम का एलान करने जैसे ही ये प्रयोग भी फेल तो नहीं हो जाएगा?

पहले चरण के कांग्रेस उम्मीदवारों के विश्लेषण से पता चलता है कि पार्टी ने 60 फीसदी से ज्यादा टिकट अगड़ी जाति के लोगों को दिए हैं. पहले चरण में पार्टी 21 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और 12 टिकट ब्राह्मणों, राजपूतों, भूमिहारों और अन्य को दिए हैं. पार्टी ने अल्पसंख्यक समुदाय के एक भी व्यक्ति को टिकट नहीं दिया है और केवल एक टिकट अति पिछड़ा वर्ग को दिया है.

अगड़ी जाति के 12 उम्मीदवारों में आठ (75 फीसदी) का मुकाबला BJP के अगड़ी जातियों के उम्मीदवारों से है. कांग्रेस के लिए ये बहुत ही मुश्किल मुकाबला है. 2019 के लोकसभा चुनावों में NDA को अगड़ी जातियों के 73 फीसदी वोट मिले थे. सामान्य वर्ग के वोटर पार्टी के भरोसेमंद मतदाता वर्ग में एक हैं. ये रणनीति न केवल कांग्रेस के लिए बल्कि पूरे महागठबंधन के लिए भी काफी जोखिम वाली हो सकती है.

जाति के आधार पर कांग्रेस उम्मीदवारों का विभाजन- पहला चरण

ये दिखाता है कि ग्रैंड ओल्ड पार्टी ज्यादा बदली नहीं है. ये अगड़ी जाति के वर्चस्व वाली पार्टी बनी हुई है जिसे हिंदी बोलने वाले प्रदेशों में 1950 के दशक से 1980 के दशक तक दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलता था क्योंकि तब ये सबसे प्रभावशाली पार्टी थी. कमजोर वर्गों से समर्थन हासिल कर

कांग्रेस ज्यादातर मामलों में अगड़ी जाति के विधायक/मुख्यमंत्री नियुक्त करती थी जिससे दूसरे समुदायों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता था.

Crowdwisdom360 के मुताबिक लोक जनशक्ति पार्टी के साथ राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) और कई दूसरी छोटी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवारों के वोट शेयर 2015 के मुकाबले इस बार अधिक होने संभावना है, जिससे विपक्ष के वोट में बिखराव हो सकता है. ऐसी स्थिति में तेजस्वी यादव को न सिर्फ ये सुनिश्चित करना है कि RJD अच्छा प्रदर्शन करे बल्कि कांग्रेस की संभावना को भी बढ़ाना होगा जो 30 फीसदी सीटों पर चुनाव लड़ रही है. महागठबंधन को अगर चुनाव जीतना है तो कैप्टन को इस बात की जरूरत है कि वाइस कैप्टन भी फॉर्म में हो. क्या कांग्रेस तेजस्वी यादव के सपने को हवा देगी या बरबाद कर देगी? हमें 10 नवंबर को पता चल जाएगा.

यह लेख मूल रूप से यहाँ प्रकाशित किया गया है

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